Wednesday, December 3, 2008

चुप रहते तो अच्छा होता?


दिल्ली में हाल ही में हुए धमाकों के दिन मुझे रिपोर्टिंग के लिए भेजा गया था, उस एक दिन को छोड़ दिया जाए तो आतंकी हमलों को लेकर क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए इस पर मेरी राय का मेरे प्रोफेशन से कोई लेना देना नहीं है। लिहाजा ये पोस्ट मेरी एक सोच है, जो हो सकता है ग़लत भी हो, पर अगर मेरी सोच सही है, तो इस पर ध्यान देने की जरूरत है। मोटे तौर पर मेरा ये मानना है कि किसी भी बड़ी आतंकी घटना की जांच के बारे में, उसकी बारीकियों की जानकारी पुलिस अधिकारियों तक ही सीमित रहनी चाहिए।

आम आदमी ये जानकर भी कुछ कर नहीं सकता कि जो हुआ वो कैसे हुआ...क्योंकि आज की तारीख में क्या हिंदुस्तान ये जानना चाहता है कि मुंबई में आतंकी दहशत फैलाने वाले कितने लोग थे? वो मुंबई कहां से पहुंचे? उन्होंने कितनी टोलियां बनाई थीं? वो कितने ग्रुप्स में थे…वगैरह-वगैरह नहीं बिल्कुल नहीं, इससे ज्यादा उसकी दिलचस्पी ये जानने में है कि वो आने वाले दिनों में ऐसे हमलों से कैसे बचा जाएगा? आतंकवादियों को किसी भी शहर में कदम रखने से पहले ही कैसे धर दबोचा जाएगा? एक आम आदमी के दिल में बैठे डर को कैसे दूर किया जाएगा? आम इंसान सुरक्षित हैं ये भरोसा कैसे दिलाया जाएगा?
अभी कल ही मुंबई के पुलिस आयुक्त हसन गफूर ने एक प्रेस कांफ्रेस करके बताया कि
1- सभी 10 आतंकी पाकिस्तान से आए थे
2- उन्हें मुंबई में कोई स्थानीय मदद नहीं मिली
3- नौ आतंकी मारे गए हैं और एक आतंकी जिंदा पकड़ा गया है
4- आतंकियों की संख्या को लेकर कोई भ्रम नहीं है
5- दस आतंकी दो-दो की संख्या के पांच समूहों में निकले थे
6- दो समूह यानी चार आतंकी होटल ताज महल में गये
7- दो-दो आतंकवादी ओबेराय समूह के ट्राइडेंट होटल और नरीमन भवन गए
8- दो आतंकी मुंबई छत्रपति शिवाजी टर्मिनस गए
9- सभी आतंकियों के पास 1-1 एके असॉल्ट राइफल और दस-दस भरी मैगजीन यानी लगभग 300 राऊंड पिस्टल की गोलियां थीं
10- आतंकियों ने 5 बम प्लांट किए थे। इसमें से दो टैक्सियों में, एक ओबेराय होटल के करीब, एक लियोपोल्ड कैफे और ताज होटल के बीच और एक ताज होटल के निकट प्लांट किया गया था


मुझे सिर्फ एक बात का डर है...क्या ये सारे दावे जो पुलिस अधिकारियों ने किए हैं, वो सही हैं? क्या पकड़े गए आतंकवादी ने जितनी जानकारियां दी हैं, वो सही हैं? सहीं हैं तो, या गलत हैं तो भी मेरी परेशानी कम नहीं होती...ये बात तो हर कोई जानता है कि इतनी बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम देने की साजिश रखने वाले आकाओं ने हमले के बाद किसने क्या कहा पर पूरी नजर रखी होगी। उन्हें पता होगा कि किस अधिकारी, किसी राजनीतिक दल, किस नेता या मीडिया ने क्या कहा...
मान लिया कि ये सारी जानकारियां जो मुंबई के पुलिस आयुक्त ने दी हैं वो सही हैं...तो अगली बार आतंक के आकाओं की योजना इससे ज्यादा पुख्ता तौर पर बनाई जाएगी...और अगर ये गलत हैं तो फिर तो आतंक फैलाने वालों के लिए रास्ता और आसान है। उन्हें पता चल ही जाएगा कि उन्होंने जो किया वो कैसे किया, इसकी सही जानकारी किसी के पास नहीं है।
हो सकता है आप मेरी राय से सहमत ना हों, पर भूलिएगा नहीं कि तमाम घटनाओं के बाद पुलिस अधिकारियों की प्रेस कांफ्रेंस में किए गए दावे गलत साबित हुए हैं। एक ही विस्फोट के मास्टरमाइंड कई बार मारे गए हैं, और किसी को याद नहीं कि जम्मू के रघुनाथ मंदिर में हुए आतंकी हमलों में दरअसल कितने आतंकवादी थे...क्या आप सहमत हैं आतंकी मामलों की जांच प्रक्रिया का कोई भी हिस्सा सार्वजनिक नहीं होना चाहिए? और तो और इस बार तो नेवी और एनएसजी के आला अधिकारियों ने भी इस ऑपरेशन के बारे में प्रेस कॉन्फ्रेंस की, क्या वाकई इसकी ज़रूरत थी? आप बताइए...

1 comment:

पंगेबाज said...

आपका कहना १००% सही है पर भाई इन्हे भी मिडिया की सहायता चाहिये होती है . साध्वी और पुरोहित जैसे हिंदु या भगवा आतंकवाद को स्थापित करने वाले पुण्य कार्य मे. तो भाई बदले मे मिडीया को भी तो कुछ सहायता चाहिये होगी इनकी :)