Friday, December 5, 2008

मज़हबी मज़दूर सब बैठे हैं इनको काम दो





अभी कल परसों ही किसी अखबार में पढ़ा था कि ग़ज़ल सम्राट ग़ुलाम अली बिहार में किसी महोत्सव के दौरान अपना कार्यक्रम पेश करेंगे। अब आज ये पढ़ने को मिला कि टेलीविजन चैनल्स पर चलने वाले लॉफ्टर शोज़ में पाकिस्तान से आए कलाकार अपने घर वापस लौट गए हैं। मैंने पढ़ा कि इन कलाकारों ने कहा है कि उनके कार्यक्रम के प्रोड्यूसर्स को कुछ संगठनों ने धमकी दी थी, लिहाजा वो वापस लौट गए। उन्होंने साफ किया है कि मुंबई धमाकों के बाद भी उनके साथी कलाकारों के बर्ताव में कोई फर्क नहीं आया था। फिर भी उन्होंने वापस लौटना ठीक समझा। हालात ठीक होने के बाद वो वापस आएंगे। हंसी मजाक के ये शोज़ आजकल हर चैनल का हिस्सा हैं (न्यूज चैनल्स का भी), ऐसे में दर्शकों को शायद इनकी कमी खलेगी....पर मेरे दिमाग में इससे आगे की बात चल रही है। मुझे लगता है कि एक बार फिर वो दौर शुरू हो गया है, जहां जल्दी ही कला और कलाकारों पर भी निशाना साधा जाएगा। कभी भी कोई भी कह सकता है कि गुलाम अली, आबिदा परवीन हिंदुस्तान न ही आएं तो अच्छा...और हमारे कलाकार तो सीमापार बिल्कुल ही ना जाएं...
मैं ज्यादा फिल्में देखता नहीं, पर जहां तक मैंने पढ़ा है कि पाकिस्तान में बनी “रामचंद पाकिस्तानी” नाम की फिल्म भारत में भी रिलीज हुई थी। इस फिल्म में एक पाकिस्तानी लड़के के गलती से भारतीय सीमा में आने को प्लॉट बनाया गया था। कहानी सच्ची थी, निर्देशक पाकिस्तानी थे और अपनी नंदिता दास ने फिल्म में अभिनय किया था।
इसके बाद “खुदा के लिए” नाम से बनी फिल्म तो मैंने भी देखी है। संगीत से आतंक तक का सफर...
बातों बातों में मुनव्वर भाई की एक ग़जल याद आ गई (अगर एक दो शब्द इधर उधर हो गए हों, तो माफी चाहूंगा) ग़जल के दूसरे शेर पर खास तवज्जो दें

हॉं इजाज़त है अगर तो एक कहानी और है
इक कटोरों में अभी थोड़ा सा पानी और है
मज़हबी मज़दूर सब बैठे हैं इनको काम दो
इक इमारत इस शहर में काफी पुरानी और है
बस इसी एहसास की शिद्दत ने बूढ़ा कर दिया
टूटे-फूटे घर में इक बिटिया सयानी और है...
इन मज़हबी मज़दूरों का ही एक रोल वो भी है, जिसका जिक्र मैं पोस्ट की शुरूआत में कर रहा था। इनका इलाज क्या है?

5 comments:

tanu sharmaa said...

आप सीमा-पार के कलाकारों की बात कर रहें है औऱ अपने ही देश के एम.एफ हुसैन साहब को भूल गए जो कहीं और निर्वासित जीवन बिता रहें है...जब ये भगवा ब्रिगेड अपने देश में ही हिंदु-मुसलमान का इतना भयानक खेल खेलती है...कि अपने ही कलाकारों को भी नहीं बख्शती तो सीमा पार तो फिर भी उन्हें हर इंसान मुसलमान नज़र आता है और मुसलमान याने इस्लाम और इस्लाम याने आतंकवाद .....इनकी ज़ड़ें तो बहुत गहरी हैं सिर्फ ऊपर की कटाई-छटाईं से काम नहीं चल सकता....पता नहीं कभी हमारा समाज इन बातों से ऊपर उठेगा या नहीं.....

सुप्रतिम बनर्जी said...
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सुप्रतिम बनर्जी said...

जल्दबाज़ी में कमेंट लिखने के चक्कर में हुई ग़लती की वजह से मैं अपने पहले कमेंट को डिलीट कर दिया। ख़ैर, शिवेंद्र भाई की चिंता सही है। लेकिन तनु जी की बात से मैं इत्तेफ़ाक नहीं रखता। दरअसल, मक़बूल फ़िदा हुसैन को दूसरे कलाकारों की पांत में रखना ठीक नहीं है। उन्होंने एक नहीं, बल्कि कई बार आर्ट के बहाने हिंदू देवी-दवाओं का मज़ाक बनाया। पता नहीं, आप कैसे प्रगतिशील लोग हैं जो अपने धर्म का मज़ाक बनते देख कर भी ख़ामोश रहना चाहते हैं! मेरे हिसाब से असली प्रगतिशीलता वही है, जो अपने साथ-साथ दूसरों के धर्म का भी सम्मान करे। और हां, विरोध के मध्ययुगीन तरीक़े को भी मैं सही नहीं मानता। फिर चाहे वो मक़बूल फ़िदा हुसैन का ही क्यों ना हो? दोनों पहलुओं पर ग़ौर करने की ज़रूरत है।

शिवेंद्र said...

सही कहा तनू आपने...दरअसल कई बार पोस्ट जैसे जैसे दिमाग में आती जाती है, लिखता जाता हूं...शायद इसीलिए हुसैन साहब का नाम दिमाग से उतर गया...आपका शुक्रिया, कम से कम कॉमेन्ट की मदद से मेरी पोस्ट का अधूरापन थोड़ा खत्म होगा

शिवेंद्र said...

सुप्रतिम की टिप्पणी ने एक नई बहस छेड़ दी है...सुप्रतिम कहते हैं कि दोनों पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है...