




एक रोज शिवी ने सवालों की बौछार कर दी
ये क्या है-वो क्या है...
ये गुल्लक है...
ये पित्ज़ा...
ये बप्पा जी हैं...
ये प्रिंटर है...
और ये इरेज़र है...
शिवी का अगला सवाल था
इरेज़र क्या होता है,
मैंने कहा
जब लिखते वक्त कोई
गलती हो जाती है
तो इरेज़र से उसे मिटा देते हैं,
शिवी बोली- मिटाकर दिखाओ,
उसे दिखाने के लिए
पहले पन्ने पर आड़ी तिरछी लाइनें खींची
फिर उन्हें मिटा कर दिखाया
खुश हो गई शिवी, बहुत खुश
मैं मन ही मन सोच रहा था
मेरी लाड़ली
काश! तूझे जिंदगी में
इरेज़र की जरूरत ही ना पड़े
(शिवी दो साल 6 महीने की हो गई है,19 तारीख को उसका मुंडन हुआ है...इस पोस्ट के साथ लगाई गई तस्वीर मुंडन से थोड़ी देर पहले की है...मुंडन के बाद की तस्वीरें भी जल्दी ही पोस्ट करूंगा। ये तस्वीरें इलाहाबाद में रहने वाले मेरे पुराने मित्र और बेहतरीन फोटोग्राफर कमल किशोर कमल ने खींची हैं।)
9 comments:
मुझे बचपन की याद आ गयी....
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मेरा ये पोस्ट आप और बच्चे भी पसंद करेंगे.......
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विश्व जल दिवस..........नंगा नहायेगा क्या...और निचोड़ेगा क्या ?...
लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से..
http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_22.html
बहुत सुंदर------
बिल्कुल सही कहा कृष्ण जी आपने, ये बच्चे हमें भी बच्चा बनाते हैं...
धन्यवाद कृतिका...
अभी चिट्ठाचर्चा में देखा शिवी को. बड़ी प्यारी है. अधिक चित्र देखने ब्लॉग पर खींच लायी. एकदम आप पर गयी है. और कविता भी बहुत अच्छी लगी.
शुक्रिया मुक्ति...
बच्चों के पास सवालों की कमी नही होती। और कई बार तो उनके सवाल बडे मासूम और गहराई लिए होते है। मेरी बेटी भी ऐसे ही सवालों की बरसात करती रहती है। और अपने को समझदार कहती है क्योंकि वो स्कूल जाती है ऐसा वो कहती है। शिवी बेटी को खूब सारा प्यार और आशीर्वाद देना जी हमारी तरफ से। और उसकी और फोटो का इंतजार रहेगा।
जमैका में मेरे एक मित्र रहते हैं राजकुमार सबलानी जी, उन्होंने इस पोस्ट को पढ़कर ईमेल किया है, उसका एक हिस्सा
Dear Shivendraji,
What a wonderfull piece of writing coming from day to day life. keep writing this way, it feels close to the heart.
सुशील जी, मेरे ब्लॉग की पोस्ट को नियमित तौर पर पढ़ने के लिए शुक्रिया। शिवी को भी मैंने स्कूल में डाल दिया है पिछले 6 महीने से-उसकी और तस्वीरें आप फेसबुक पर देख सकते हैं। अपनी बिटिया से भी परिचय कराइए, और हां एक मशहूर शेर की वो लाइन भी याद आ रही है-
"दो चार किताबें पढ़कर ये हम जैसे हो जाएंगे"
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