

जाने क्यों आजकल हर घर से बहुत शोर आता है
धब-धब-धब की आवाजें,
लगता है छत पर कोई कूद रहा है
चीखना चिल्लाना, रोना-गाना
लगता है “कुछ” हो गया
जाने क्यों आजकल सूरज भी अकड़ा हुआ है
नाराज है शायद मुझसे
सबसे पहले जगाने के लिए मुझे ही आ जाता है
मैं रात चाहे कितनी देर से सोया हूं
सुबह सबसे पहले जग जाता हूं
अपने आस-पड़ोस में सबसे पहले
बाहर निकलकर देखता हूं
तो इक्का दुक्का लोग नजर आते हैं
जाने क्यों आजकल दूसरों की बालकनी पर
कुछ ज्यादा ही सूखते कपड़े दिखते हैं मुझे
तमाम कपड़े, एक के ऊपर एक
गजे हुए से...एक दूसरे से चिपके हुए
रंग बिरंगी क्लिपों के साथ अटके हुए से
जाने क्यों आजकल मेरे घर में खाना बनाने वाला
बड़े ‘एटीट्यूड’ में रहता है
लगता है किसी पांच सितारा होटल का कुक हो
बहुत बिजी, काफी प्रोफेशनल
आता है-खाना बनाता है-चला जाता है
बात करने का टाइम ही नहीं है उसके पास
जाने क्यों आजकल मेरे बेडरूम की घड़ी
बहुत जोर जोर से आवाज करने लगी है
लगता है जानबूझकर परेशान कर रही हो
घड़ी, घड़ी की तरह नहीं
घड़ियाल की तरह बजती है
टक...टक...टक....टक
या तो इसे ठीक कराना होगा या फिर नई घड़ी खरीदूंगा
जाने क्यों आजकल घर की दीवारें एकदम बेरंग दिखती हैं
कहने को लाल-नीले-हल्के नारंगी रंग से रंगी पुती हैं
पर जाने क्यों उन रंगों में जान नहीं रही
कभी कभी तो मन करता है
कि इन पर दोबारा रंग करवा दूं
जाने क्यों आजकल बातों बातों में
आंखें गीली हो जाती हैं
कोई जीत जाए तो आंसू आ जाते हैं
कोई हार जाए तो आंसू आ जाते हैं
छिपाने पड़ते हैं अपने आंसू
लोग क्या कहेंगे, क्या सोचेंगे मेरे बारे में…
जाने क्यों वो गुल्लक आजकल मुझे घूरता रहता है
करीब 2 महीने पहले खरीदा था
90 फीसदी से ज्यादा भर भी गया है
पर पिछले एक हफ्ते से उसमें
एक रूपया तक नहीं पड़ा
क्या करूं घर लौटने पर सिक्का बचता ही नहीं जेब में
जाने क्यों...जाने क्यों...
(पिछले एक हफ्ते से शिवी इलाहाबाद में है और मैं गाजियाबाद में-अभी आधे घंटे पहले ही पता चला है कि जब वो लौटेगी तो मैं चेन्नई जा चुका रहूंगा...)